एक प्रणय गीत : तुम हमारी जीत भी हो .....
तुम हमारी जीत भी हो हार भी | नीड़ का निर्माण करने को विकल दो विहग जाने कहाँ से आ मिले हैं विश्व में नव-गंध भर देंगे कभी - दो सुमन अब इस धरा पर खिल उठे है कल तुम्हारा रेशमी आँचल कहेगा मैं तुम्हारा रूप भी , श्रृंगार भी | खींच कर दो कोर काजल की नयन में...
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आनन्द पाठक
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[16 Jun 2009 10:43 AM]



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