एक गीत : वह बैसाखी ले एक ....
वह बैसाखी ले एक हिमालय नाप गए मैं उजियारी राहों में भटक गया हूँ वह अँधियारी राहों से चलते आए मैं आदर्शों का बोझ लिए कंधों पर वह ’वैभव’ हैं ’ईमान’ बेचते आए मैं चन्दन,अक्षत,पुष्प लिए वेदी पर वह चेहरा और चढा़ कर देहरी लांघ गए वह हर दर पर शीश झुकाते चले...
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आनन्द पाठक
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[26 Jul 2009 01:37 AM]



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