कुछ मुक्तक

गीत  ग़ज़ल  औ गीतिका कुछ मुक्तक हो भले तीरगी रास्ता पुरखतर दूर आती न मंज़िल कहीं हो नज़र हम चिरागों का क्या है जहाँ भी रखो हम वहीं से करें रोशनी का सफ़र ज़माने से पूछो न बातें हमारी गमो-दर्दे-दिल की वो रातें हमारी अगर पूछना है तो पूछो हमी से ’आनन्द’ नम क्यूँ है आँखे तुम्हारी... [पूरी पोस्ट]
writer आनन्द पाठक
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[09 Aug 2009 02:21 AM]

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