ऐसे कुछ अशआर चाहिये
इधर कुंठा उधर त्रास है आँखें वीरान मन नीराश है डरे सहमे से दिन हैं काली डरावनी हैं रातें भटके हुओं को राह दिखाये ऐसे कुछ चिराग चाहिये सोते हुओं को जगाये ऐसे कुछ अशआर चाहिये ऊँची दीवारें हैं खिड़कियॉं हैं तंग निकलने के रास्ते हो गये हैं बंद हताशा में...
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मथुरा कलौनी
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[23 Dec 2008 03:29 AM]



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