हंस सब उड़ गए
सूखती झील में काइयाँ रह गईं; हंस सब उड़ गए मछलियाँ रह गईं। रेत सी उम्र कण कण बिखरती रही, हाथ खाली बँधी मुट्ठियाँ रह गईं। सत्य को बिन सुने ही अदालत उठी, आँसुओं से लिखी अर्जियाँ रह गईं। अब खरीदे हुए मंच के सामने, बस ख़रीदी हुई तालियाँ रह गईं। यह सियासत...
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chandrabhan bhardwaj
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[12 May 2009 10:15 AM]



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