मेरा अनुवाद तुम

bhardwaj'sblog मूल कविता हूँ मैं मेरा अनुवाद तुम; मेरे लेखन की हो एक बुनियाद तुम। मैं अमर शब्द हूँ तुम अमर काव्य हो, हूँ परम ब्रह्म मैं हो अमर नाद तुम। तुम हो काशी मेरी तुम हो काबा मेरा, मन के मन्दिर में मस्जिद में आबाद तुम। जिसमें आठों पहर ज्योति जलती सदा, सिद्ध व... [पूरी पोस्ट]
writer chandrabhan bhardwaj
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[03 Aug 2009 07:25 AM]

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