जिन्ना, राज ठाकरे, तोगड़िया, शाहबुद्दीन जैसे लोग और धार्मिक ग्रन्थ.
क्षमा, अहिंसा, आपसी सद्भाव वग़ैरा वग़ैरा मानवीय संवेदना से उपजे भाव हैं. इन्हे सीखने या समझने के लिए किसी क़ुर'आन, वेद, गीता या बाईबल की ज़रूरत नहीं है. इन ग्रंथों की सार्थकता तब रही होगी जब ये ४५०० साल से लेकर १५०० साल पहले तक लिखे गये थे, आज नहीं...
[पूरी पोस्ट]
हर्ष प्रसाद
7
0
0
0
0
[01 Nov 2008 07:47 AM]



Shuffle








