वहाँ भी अनंत...यहाँ भी!!!
वहाँ भी सरक कर पत्तों से बूंदे अनंत में घुल जाती हैं यहाँ भी शब्द ह्रदय की गहराइयों से टपक कर अनंत बन जाती है। शुरू का बोध अगम्य निश्छल कार्य कल्पना के पार नईया खेता यहाँ भी नाचती अहसासों में अबंध गीता की परिकल्पना। कितने दिवस बीत गए उम्मीद-ए-आशाओं म...
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Divine India
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[07 Jul 2007 05:21 AM]



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