"प्रेम" पंथ है अटपटो……
मैं" ने माना है…तुम चली गई हो दूर बहुत , मेरी छाया से भी अलग, ख्वाबों के शरहदों के भी पार… पर "हृदय" ने जाना है…उसमें रची-बसी हो तुम, कहीं अंतरंग लय में भींगो रही हो तुम… "मैं" ने माना है… दु:ख-विरह की उद्वेगावस्था हो तुम, संताप की परमसीमा…एक मात्र इ...
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Divine India
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[29 Jul 2007 02:27 AM]



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