इतना सबकुछ बाहर है…"फिर-भी"……
मौज़ों में फैला आध्यात्म अज्ञानों पर बैठी गीता-गान है, नि:सीम शून्य अनंत में पंखों पर उड़ती आशा है , उत्सव ही उत्सव मदिरालय में उसके, क्यों अंतरतम खाली है… इतना सबकुछ बाहर है, फिर-भी भीतर खाली है… । ममता और करूणा है, कण-कण में बहती लहरों की तरह परिवर्त...
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Divine India
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[04 Sep 2007 06:51 AM]



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