आगाज़ सजग; वास्तविकता मौन…।

Divine India कतरा-कतरा जीवन की डोर सिमटती जाती है संध्या के लाल गर्भ में… बेख़ौफ नाचती आहिस्ते से घटती जाती है सांसों में… दौड़ अंधी, भाग दुनियाँ की बैचैन चेहरों में उगती है मायूस पल तृष्णा की कैद आजाद मन पर चढ़ती जाती है…। सभी भाग रहे बस औरों से आगे-आगे, किस ओर कहा... [पूरी पोस्ट]
writer Divine India

अनंत मन टटोल…

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[26 Nov 2007 03:41 AM]

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