प्रेम पंथ है…आत्म प्रतीति।
पता नहीं मुझे इस जिंदगी के और कितने मायने हैं… समझ नहीं आता कौन दु:ख के, कौन सुख के हैं… सभी को साथ लेकर परखना……? संभव नहीं, वक्त निकलता जाता है, कई उलझे मोड़ छोड़ देता है मदिले संरचना में इसके फिर देवदास चला आता है अपने को भींगाकर रस में पतला सा दर्द...
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Divine India
प्रेम पंथ ऐसो कहाँ…
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[26 Mar 2008 14:42 PM]



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