प्रीत की लगन या मुक्ति मार्ग

Divine India आगोश में निशा के करवटें बदलता रहता है सवेरा लिपटकर उसकी संचेतना में बिखेरता है वह प्रांजल प्रभा… संभोग समाधि का है यह या अवसर गहण घृणा का फिर-भी तरल रुप व्यक्त श्रृंगार, उद्भव है यह अमृत का… उत्साह मदिले प्रेम का… जागते सवेरे में समाधि… अवशेष मुखरित... [पूरी पोस्ट]
writer Divine India

का कहूँ उस प्रीत की…

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[29 Dec 2008 02:46 AM]

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