एक छोटे शहर की लड़की (२)

feminist poems रिक्शे पर बैठी जो हमेशा सखियों के साथ बस की भीड़ में आज धक्के खाती है, शाम को कमरे पर आकर एक-एक पैसे का हिसाब लगाती है, पढाई भी करती है काम पर भी जाती है, परम्परा और आधुनिकता में मेल बैठाती है महानगर की लड़कियों से अलग नज़र आती है एक छोटे शहर की लड़क... [पूरी पोस्ट]
writer mukti
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[10 Jul 2009 17:42 PM]

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