ढ से ढक्कन......ढ से ढोल

ननिहाल ढ कहता है ढम-ढम-ढम, देखो, खरगोश ढोल बजाए, हिरण, गदहे, बंदर के संग, छोटू हाथी भी गीत गाए, सिंहराजा बनकर दूल्हा, मन ही मन मुस्कुराएँ, वनवासी सब बने बराती, हुड़दंग मचाते जाएँ, उधर सिंहनी के घर, सब विवाह के गीत गाएँ, सिंहनी भी दुल्हन बनकर, आज बहुत इठलाए।... [पूरी पोस्ट]
writer प्रभाकर पाण्डेय
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[20 Jun 2009 07:56 AM]

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