गुडिया रोई मुन्नी रोई
यह कविता रेखा दी ने अपनी यादों की पिटारी से निकाल कर हमें दी है। आप भी अपनी पिटारी खोलें और कवितायें bhejen gonujha.jha@gmail.com पर नन्हीं मुन्नी ओढे चुन्नी गुडिया खूब सजाई है, किस गुड्डे के साथ हुई इसकी आज सगाई है. रंग बिरंगी ओढे चुनरिया माथे पर चम...
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Vibha Rani
विभा रानी
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[19 Nov 2008 23:42 PM]



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