कारवां के साथ रहकर मैं अकेला ही रहा
थक रहे है पाँव लेकिन मन थका लगता नही. आ रही है सांझ लेकिन पथ चूका लगता नहीं. कारवां के साथ रहकर मैं अकेला ही रहा , ठौर तो मिलते रहे पर घर मिला लगता नहीं. बीज थे संकल्प के वट-वृक्ष बनने के लिए. रीढ़ में थी ग्रंथियां यह तन तना लगता नहीं. बोझ थी यह जिंद...
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राज यादव
हिन्दी कविता
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[11 Jan 2008 12:03 PM]



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