तुने होंठों को लरज़ने से तो रोका होता?
तुझे इजहार -ऐ -मुहब्बत से अगर नफरत है तुने होंठों को लरज़ने से तो रोका होता बे-नियाजी से, मगर कंकपाती आवाज़ के साथ तुने घबरा के मेरा नाम न पूछा होता तेरे बस में थी अगर मशाल -ऐ -जज्बात की लौ तेरे रुखसार में गुलज़ार न भड़का होता यूं तो मुझ से हुई सिर्फ़...
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राज यादव
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[16 Jan 2008 09:21 AM]



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