खुशियाँ
खुशियाँ मेरे दरवाज़े तक आयी , मगर दहलीज़ लाँघ न पायी ! हाथ बडा कर उन्हे समेटना चाहा चाहते हुए भी समेत न पायी जीवन कि खुशियों को करने हासिल , कुछ दूर तक दौड़ना चाहा ! पर वक्त की रफ़्तार के संग , ज्यादा दूर तक दौड़ न पायी ! जीवन की शाम ढलने को है , मैंने...
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शिवानी
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[02 Jul 2008 06:47 AM]



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