सौगात
ये ग़म किसी और ने दिए होते तो शायद में भुला देती ! मगर मान कर ये सौगात तेरी इन्हें दिल से लगाए बैठी हूँ ! वो दरीचे किसी और इमारत के होते तो शायद -- नज़र झुका के चुपचाप चली जाती ! मगर आज उन्ही दरीचों को नज़र भर देख के चली जाती हूँ ! रात ढलने को है और नी...
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शिवानी
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[01 Jul 2008 04:26 AM]



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