यह जमीं है गांव की
गौर से देखो इसे और प्यार से निहार लो आराम से बैठों यहा पल दो पल गुजार लो सुध जरा ले लो यहां पर एक हरे से घाव की कि यह जमीं है गांव की, हां ये जमीं है गांव की...... कुल कुनबा और कुटुम का अर्थ बेमानी हुआ ताऊ चाचा खो गये सब खो गई बडकी बुआ गांव भर रिश्तो...
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योगेश समदर्शी
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[20 Sep 2007 03:09 AM]



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