जीना चाहते है वह मर कर.

शब्द सृजन नाखुश इतने, नफरत कर कर. रक्त पीपासा, उर में भर कर. अपना नया ईश्वर रच कर, जीना चाहते हैं वह मर कर. हाथ नहीं हथियार हैं उनके, मस्तक धड से अलग चले है. ईच्छा और विवेक से अनबन, आस्तीन में सांप पले हैं. काम धर्म का मान लिया है. जाने कौन किताब को पढ कर. अपन... [पूरी पोस्ट]
writer योगेश समदर्शी
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[09 Feb 2009 09:00 AM]

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