इस होली पर कैसे, करलूं बातें साज की
अभी हरे हैं घाव, कहां से लाऊं चाव, नहीं बुझी है राख, अभी तक ताज की खून, खून का रंग, देख-देख मैं दंग, इस होली पर कैसे, करलूं बातें साज की उसके कैसे रंगू मैं गाल जिसका सूखा नहीं रुमाल उन भीगे होठों को कह दूं मैं होली किस अंदाज की इस होली पर कैसे, करलूं...
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योगेश समदर्शी
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[07 Mar 2009 10:01 AM]



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