जीवन सन्दर्भ
नज़्म मेरी किसी ज़मीन पर तेरे सूरज की रोशनी , अब कभी नही आती , मेरे प्यार के बगीचे मे तेरी मुहब्बत की बुलबुल कभी नही गाती, क्या करूँ आजकलखुद से पशेमान बहुत हूँ दुनियावी रंग देख के हैरान बहुत हूँ, चाहता हूँ कोई ताबीर नई रच पाऊँ खुद ही खुद की नज़र में...
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डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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[11 Apr 2009 16:05 PM]



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