बिखरे खत
कुछ खत पहुँचे, कुछ पहुँचे ही नहीं, कुछ उत्तरी दिशा में देवदारों पर अटक गए, कुछ दक्षिण दिशा में संदल बन में भटक गए. दरवाज़े की ओट में किसी की नज़र में रह गए, किसी राह में साँझ के साथ डूबते चले गए, तुम्हारे साथ चलते हुए कुछ लिखे गए पर टूटे माणिक से हर जग...
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रजनी भार्गव
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[10 Dec 2007 08:04 AM]



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