चेतना के फूल
कमरे में थी एक मेज़, दो कुर्सियाँ, सीलिंग से लटके लैम्प की रोशनी गोल सीमित दायरे में. उससे परे थे कुछ साए, खिड़की में रखे गमले के, कांउटर पर कप और प्लेट के, खूँटी पर टँगे कपड़ों के. समय के सन्नाटे में, झाँक रहा था सूरज का एक टुकड़ा, आधा मेज़ पर और आधा फ़र्...
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रजनी भार्गव
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[14 Jan 2008 23:00 PM]



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