प्रार्थना
धूप में लिपटी एक प्रार्थना, कुछ चुप, कुछ कहती हुई, दूब के साथ उग रही थी। मेरी कोट की जेब में भूली हुई मेवा की तरह अंगुलियों में कुलमुला रही थी। मुट्ठी में भर कर, मन में कुछ बुदबुदा कर, फूँक मारी थी। तुम्हारी आँखों के अथाह सागर में गुम हुई खामोशी बता...
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रजनी भार्गव
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[18 Jan 2008 20:50 PM]



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