सभ्यता
ज़िन्दगी के पलों को गुणा, भाग कर , घटा, जोड़ कर , बहा दिया था नदी में एक दिन मैने । नदी - जो ज़मीन के नीचे, पुरखों के पांव तले और मेरे पाँव के नीचे भी बहती रही है सदियों से । मैं देखती हूँ कि उभर आये हैं भित्तिचित्र नदी के मुहाने पर । और... ये भी देख रह...
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रजनी भार्गव
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[21 May 2008 12:10 PM]



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