आकांक्षा
आकाश को कितनी ही बार अपने हाथों में ले कर दूधिया बादल से नहाई हूँ मैं, आकांक्षाओं को कई बार अपनी आँखों में संजो कर रंग भरी पिचकारी सी छूटी हूँ मैं, और फिर, गुलमोहर की तरह गर्व से तुम पर बिखर गई हूँ मैं, क्षितिज का प्रथम पहरेदार आकाश में वो जो ध्रुव त...
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रजनी भार्गव
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[03 Jun 2008 00:01 AM]



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