नानाजी की टोपी

रजनीगन्धा मैं नानाजी की टोपी, चाँद की किरण से सीती थी। अंदर से टोपी उधड़ गई थी। उम्र में बड़ी हो गई थी। थकी-हारी कुछ बेजान सी लगती थी। जब तागे निकल जाते थे तो झूमर से लहराते थी। बड़े छोटे बेतरतीब से माथे पर नज़र आते थे। टोपी अब भी पुख्ता थी। ऐसे लगता था जैसे कोई म... [पूरी पोस्ट]
writer रजनी भार्गव
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[02 Sep 2008 20:24 PM]

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