आरिगामी
धूप और पत्तों की आरिगामी मेरी खिड़की पर बन रही थी, सुबह के बदलते पहर मुड़ते, खुलते खिड़की के एक कोने पर सीमित रह गए थे। उस आरिगामी में रह गई थी अब, एक मैना, एक पत्ती, एक टुकड़ा धूप। धूप सरकी, पत्ती टूटी, मैना उड़ गई, और, अब रह गया है सिर्फ़ कोरा कागज़ दूसरे...
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रजनी भार्गव
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[18 Sep 2008 22:33 PM]



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