इच्छाएं, सेकेण्ड की सुई की तरह अन्दर ही अन्दर एक ही वृत में गोल घूमती है... समुद्र किनारे फ़िर जंगल एक नए सिरे से जलता है, पीछे काली ज़मीन छोड़ता...
एक अशिष्ट बदलाव था अध् चटके फूल चटकीली धुप मैं खिले बिना ही सिरे से काले हो सूख कर झड़ रहे थे गर्म बजती हुई हवा सन्नाटे को चीरती, भरी दोपहरी अजीब तर्क जुटाती,...गले ना उतरने वाले ,एक पुर इत्मीनान समय का कोने मैं दुबके बैठे रहना ..किसी विस्मृत नाद का...
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Vidhu
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[14 Jun 2009 12:07 PM]



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