गीत को तुम्हारे...........
गीत को तुम्हारे तरसता है जी ..... तुम्हारे उन नैनों के लिए जिन में बैठी हंसती मै लजीली उस लम्हे की डाली को झुकाता रहता है जी .... जो तुम्हारे स्पर्श से पुलके उस कौमुदी के बिखरे कणों को बिनता रहता है जी ...... बस पुराना जो ख्वाब लौटा सिर्फ़ तुम्हारे ल...
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swati
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[17 Dec 2008 14:05 PM]



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