व्यवस्था के अंदर, बाहर और ऊपर

अनामदास का चिट्ठा मैं इस व्यवस्था से ख़ुश नहीं हूँ लेकिन इसका हिस्सा हूँ. जीवन और परिवार चलाना है तो इस व्यवस्था के भीतर ही चलाना होगा. सारे क़ानून मानने होंगे, जिन्हें उन लोगों ने लिखा है जिन्होंने क़ानून लिखते वक़्त उसका जवाब भी अलग से लिख लिया था, ठीक वैसे ही जैसे... [पूरी पोस्ट]
writer अनामदास

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[29 Jun 2008 20:33 PM]

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