घर-घर
बचपन में मैं कुछ तकियों और चादरों का मिला कर घर बना लिया करता था ... उसमें थोड़ा पानी और खाना आने की एक जगह छोड़ दिया करता था। बहुत समय तक मुझे यह लगता था कि .... मैं पूरी ज़िदगी ऎसे ही रह सकता हूँ .... । माँ चिल्ला-चिल्ला कर कहती कि-’बस बहुत हो गया...
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मानव
अपने से...
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[10 Jun 2009 03:36 AM]



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