दीदार-ए-यार
बहते चश्मों को तरसते मृग शावक
सागर में समाने को बेताब दरिया
जैसे पपीहे को स्वाति बूँद की प्यास
ख़ादिम को दीदार-ए-यार की आस…
कुंतल लट से लिपट खुश है दिल
बँधकर जंजीर में दीवानगी हुई ऍसी
तिशनगी बुझा रही हैं निगाहें उनकी
दीदार-ए-यार ही अब ख़ुराक बन ग...
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Veena
hindi poetry
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[09 Aug 2009 03:49 AM]



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