सूरज निकल रहा हॆ

नया घर सूरज निकल रहा हॆ ऒर तुम सो रहे हो. स्वपनों की दुनिया में कहां खो रहे हो. स्वपन सिर्फ स्वपन होते हे. सुनहरे स्वपन रुपहले स्वपन मीठे-मीठे जहरीले स्वपन. ओ भईया! कपडा बनाने वाले ओ भईया! अनाज उपजाने वाले अरे ओ बाबू! दफ्तर को जाने वाले जरा आंखें खोलो तो ये... [पूरी पोस्ट]
writer विनोद पाराशर
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[07 Oct 2007 03:48 AM]

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