उठते हुए सवालों को अब न दाबिये
उठते हुए सवालों को अब न दाबिये कितने गहरे हुए ज़ख्म उनको मापिये? हर चेहरे ने ओढ़ा हॆ नकाब कॊन किसका क़ातिल हॆ कॆसे जानिये? ख़ुद नहीं बदला, ये मॊसम का मिज़ाज सय किसी की हॆ ज़रुर मानिए न मानिए लबालब भर चुका हॆ, सब्र का तालाब अब रेत की दीवार हॆ कव तक थामिए ?...
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विनोद पाराशर
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[31 Jan 2008 12:43 PM]



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