राँझे फना होते हैं अब भी प्यार में
आजमाना था कि कितना जोर है पतवार में । नाव हमने डाल दी, चढ़ती नदी की धार में। तुम बड़े नादान हो जो रूह लेकर आ गए, सिर्फ कीमत जिस्म की है अब यहाँ बाज़ार में। रात के अंतिम पहर तक सिसकियाँ आती रहीं, एक बरगद कट रहा था, काठ की दरकार में। पीटते हो ढोल जाने क...
[पूरी पोस्ट]
प्रताप नारायण सिंह
7
0
0
0
0
[26 Aug 2009 04:36 AM]



Shuffle








