वो भी तो जरा तड़पे जो मुझको रुलाती है ...

कुछ सोंचा कुछ बाक़ी है कोशिश जो किया मैनें अब याद ना वो आए पर याद को क्या कहेना वो आ ही जाती है चाहूं जो भुलाना मैं उनको हरदम हरपल तब याद बराबर क्यूं उनकी ही आती है हर एक फिजाओं में उनकी ही वफाएं हैं फरियाद करें क्या हम हमको ही सताती है एहसान जरा मुझ पर ये याद करो इतना वो... [पूरी पोस्ट]
writer anilpandey
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[29 Aug 2008 05:57 AM]

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