हम जूझ रहे हैं ...........

कुछ सोंचा कुछ बाक़ी है घूम रहे हैं आज हम बेसुर, बेताल और बिना किसी कारण के हम घूम रहे हैं कहीं जनता की खीझ है एक , एक दूसरे के ऊपर टूट रहा पछाड़ने के चक्कर में , तेज रफ्तार से गिरते लड़खड़ाते कूद रहा तो कहीं गाड़ियों की कर्कश आवाज यहीं कहीं रिक्शेवान की चलती सांसे हैं चपटे गा... [पूरी पोस्ट]
writer anilpandey
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[11 Oct 2008 05:34 AM]

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