.कुछ सोंचा कुछ बाक़ी है

कुछ सोंचा कुछ बाक़ी है अभी अभी छूटा था माँ का आँचल दोस्तों का साथ तो मानो भूला भी ना था चलता था मेड़ पर तो पैर डगमगाते थे सच , चड्ढी का नाड़ा बांधना भी तो नहीं सीखा था उठा हाथ पिता का तो मानों मैं बड़ा हो गया ॥ दिन दिन महीने महीने रेघता एक कपड़े के लिए जूते तो स्वप्न ही हो... [पूरी पोस्ट]
writer anilpandey
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[11 Oct 2008 04:48 AM]

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