वासना

कुछ सोंचा कुछ बाक़ी है आ रही थी वह एक अदृश्य स्वप्न - सा यथार्थ का रूप लेते धीरे धीरे धीरे स्मृति पटल में तेज ठण्ड में सूर्य की प्रथम किरण - सा हल्का धूप - देते जरूरत नहीं थी धूप की शीतलता की भी नहीं आवश्यकता एक जलन की थी तपन की थी सिरहन और शिष्कन की थी बन आहार वह विशिष्ट... [पूरी पोस्ट]
writer anilpandey
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[27 Mar 2009 08:13 AM]

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