ग़ज़ल

संजीवनी अब सुनाई ही नहीं देती है जनता की पुकार। इस तरह छाया हुआ है उनपे गद्दी का खुमार ॥ अब दुकानों से उधारी दूर की एक बात है- जब बगल वाले नहीं देते हैं अब हमको उधार ॥ लाँघ पाना या गिरा पाना जिसे मुमकिन नहीं - हर दिलों के दरमियाँ नफरत की है ऊँची दिवार॥ सैकड़... [पूरी पोस्ट]
writer विनय ओझा 'स्नेहिल'
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[07 Jan 2008 07:11 AM]

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