कविता

संजीवनी मुझे मालूम न था ऐसे भी दिन आएंगे। रहनुमा राह्जनों के शिविर में लाएंगे ॥ बढ़ा के दोस्ती का हाथ वे हमारी तरफ - हमारे दुश्मनों से हाथ भी मिलाएँगे॥ सियाह रात भी रोशन हो चाँदनी जैसी- दिए हम आस के पलकों पे यूँ जलाएँगे॥ घर पे रह जाएगा मालिक भी हाथ मलता हुआ-... [पूरी पोस्ट]
writer विनय ओझा 'स्नेहिल'
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[19 Feb 2008 05:45 AM]

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