क्या कहें ?कैसे कहें?

संजीवनी क्या कहें कैसे कहें कुछ कहना भी दुश्वार है । सिर पे सच्चाई के अब लटकी हुई तलवार है ॥ सोंच में बैठा हुआ मांझी करे तो क्या करे? बिक चुकी तूफ़ान के हाथों सभी पतवार है॥ जिन दियों से रोशनी मिलती नहीं वो फोड़ दो- उन दियों को ताख पर रखना ही अब बेकार है॥ खौफ... [पूरी पोस्ट]
writer विनय ओझा 'स्नेहिल'
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[27 Mar 2008 03:19 AM]

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