दोहे

संजीवनी शेख जाहिरा देखती कठिन न्याय का खेल। सच पर जोखिम जान की झूठ कहे तो जेल॥ खल नायक सब हैं खड़े राजनीति में आज। जननायक किसको चुनें दुविधा भरा समाज।। क्या हिंदू क्या मुसलमाँ ली दंगो ने जान। गिद्ध कहे हैं स्वाद में दोनो मॉस समान॥ जिसको चक्की पीसनी थी जाकरके... [पूरी पोस्ट]
writer विनय ओझा 'स्नेहिल'
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[10 Oct 2008 04:50 AM]

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