आंधियों में दिए हम जलाते रहे
आँधियों में दिये हम जलाते रहे । नीद अँधियारों की हम उड़ाते रहे ॥ बस उन्ही को ही मंज़िल मिली दोस्तों - ठोकरें खाके जो मुस्कराते रहे॥ ये न पूँछो कि कैसे कटी ज़िन्दगी- अश्क पीते रहे ग़म को खाते रहे॥ गर न पाया कभी काट खाया उन्हें - दूध साँपों को जो थे पिला...
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विनय ओझा 'स्नेहिल'
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[23 Dec 2008 02:13 AM]



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