सचेतन में रहेगी पीड़ा
अकेला बैठ अपनी कुर्सी पर मैं सोचता हूँ, सोचता हूँ और हैरान होता हूँ चुप हो जाता हूँ, इतना चुप कि बेआवाज़ी भी सन्न हो जाती है कैसी अफ़ीम घुली थी उन दिनों में जब सड़क पर गुज़रते लोगों से बेपरवाह मैं चूमता था उसका चेहरा हाथों में लेकर? पतझड़ में जब पेड़ ठूँठ...
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महेन
कविता-अकविता
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[01 Nov 2008 17:52 PM]



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