ये रिश्ते भी कितने अजीब होते हैं

kuch ehsaas आज बरसों बाद तुम्हे देखा अच्छे लग रहे थे काली टीशर्ट और जींस में पर तुम्हे कह भी न पायी बस...यादें खींच कर ले गयीं बीते दिनों में अभी कल की ही तो बात थी तुम शामिल थे मेरी ढलती शामों और उनींदी रातों में हमारी ख्वाहिशों ने साथ ही तो मचलना सीखा था याद ह... [पूरी पोस्ट]
writer pallavi trivedi

नज़्म

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[11 Oct 2008 10:49 AM]

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